डोभाल साहब! शुक्र मनाइये समाज मुर्दा हो गया है

देश के एक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं जिन्हें उनके कुछ लोग जेम्स बॉन्ड भी कहते हैं नाम है अजीत डोभाल। वह युवकों के सामने देश की मौजूदा सुरक्षा चिंताओं या फिर दुनिया में भारत की मौजूदगी को कैसे दर्ज कराया जाए इसको लेकर कुछ बताने और उनसे सलाह-मशविरा करने की जगह सैकड़ों साल पुरानी घटनाओं में झूठ और सच का नमक-मिर्च लगाकर उसका आज बदला लेने का आह्वान कर रहे हैं। चलो अपने पद की गरिमा का आपको खयाल नहीं है। कम से कम अपनी उम्र का तो ख्याल रखते डोभाल जी। 

80 साल का बुजुर्ग बच्चों से हिंसा करने या फिर किसी से बदला लेने की बात करे तो क्या यह उसके लिए शोभा देता है? ये जनाब अपना काम नहीं कर रहे हैं। चीन ने आज ही इस बात की घोषणा की है कि जम्मू-कश्मीर की शक्सबाग घाटी उसका हिस्सा है। इसके पहले वह पूरे अरुणाचल को अपना क्षेत्र बता ही चुका है। लद्दाख के गलवान में वह भीतर तक घुस चुका है। और इस तरह से वह देश के तकरीबन 43 हजार वर्ग किमी जमीन को कब्जाए बैठा है। इस मोर्चे पर ‘जेम्स बांड’ साहब की अक्की-बक्की गोल है। वहां कोई जुगत काम नहीं कर रही है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हैं कि अपमान पर अपमान किए जा रहे हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा हो जब भारत के खिलाफ अमेरिका से किसी न किसी तरह की बात न होती हो। वह कभी बयान के तौर पर होता है तो कभी फैसले के तौर पर। कभी ट्रम्प टैरिफ ज्यादा करने की घोषणा कर देते हैं तो कभी भारत-पाक युद्ध को रोकने के श्रेय का बयान दे डालते हैं। अभी भारत को उन्होंने रूस से व्यापार का दंड 25 फीसदी टैरिफ बढ़ाकर दिया ही था कि अब ईरान से व्यापार करने पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ की तलवार सामने कर दी है। 

पगलाए ट्रम्प ने जिस तरह से वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति मदुरो और उनकी पत्नी का अपहरण किया है वह संप्रभुत्ता और स्वतंत्रता में विश्वास करने वाले किसी भी देश के लिए किसी शर्म से कम नहीं है। ऐसे में उसका विरोध करने की जगह अगर कोई उस पर चुप्पी साध लेता है तो वह दर बेशर्मी कहलाएगी। और यह काम अगर भारत जैसा देश करे जिसने साम्राज्यवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी हो तथा स्वतंत्रता और संप्रभुता की क्या कीमत होती है उसको जानता हो, तब मामला और गंभीर हो जाता है।

इन सारे मसलों पर डोभाल साहब की कोई राय नहीं है। न ही वह सरकार को कोई सलाह देना चाहते हैं। जिसके लिए वह बनाए गए हैं। वह अपने दायरे से बाहर जाकर जहर भर रहे हैं उन युवाओं के जेहन में जिन्हें अभी अपनी लंबी जिंदगी पार करनी है। नफरत और घृणा का यह जहर आखिर कहां जाएगा? क्या यह इसी समाज में विष बनकर एक दूसरे की रगों में नहीं दौड़ेगा? और अंतत: पूरे समाज को ही नुकसान पहुंचाएगा। जिसकी चपेट में यह मौजूदा पीढ़ी भी होगी जिसको डोभाल साहब यह सलाह और सीख दे रहे हैं। 

अमूमन तो डोभाल साहब इस तरह की कोई सीख दे ही नहीं सकते हैं। और जैसी सीख उन्होंने दी है अगर भारत में कोई सभ्य समाज अपने लोकतांत्रिक वजूद के साथ अभी जिंदा रहा होता तो दो मिनट के लिए भी उनका अपने पद पर बने रहना मुश्किल हो जाता। देश के शीर्ष निकाय पीएमओ में बैठा शख्स खुलेआम नौजवानों से एक समुदाय से बदला लेने का आह्वान करे क्या ऐसा किसी आधुनिक और सभ्य समाज में संभव है? इस देश में अगर सर्वोच्च न्यायपालिका भी जिंदा होती तो वह अब तक मामले का स्वत: संज्ञान लेकर डोभाल साहब को आईना दिखा चुकी होती। लेकिन ऐसी सारी संस्थाएं मर गयी हैं। या फिर उन्होंने अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ लिया है। लेकिन जब कुएं में ही भांग पड़ी हो तो फिर किसका-किसका कोई मुंह पकड़ेगा। 

उसी मंच से देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठे नेता ने जो कहा है वह डोभाल साहब का भी कान काटने वाला है। युवाओं के दिमाग को चेतना संपन्न बनाने और उनके विवेक को और विकसित करने की जगह पीएम मोदी ने उनसे भगवान बजरंगबली को सोशल मीडिया पर चल रहे गेमों का हिस्सा बनाने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि हनुमान समेत तमाम देवी-देवताओं से जुड़ी पौराणिक कथाओं को इन खेलों का हिस्सा बनाइये। जिससे दुनिया का भारत की संस्कृति से परिचय हो।

बच्चों में ज्ञान-विज्ञान से लैस कर उन्हें चेतना संपन्न बनाने की जगह अगर देश का मुखिया यह आह्वान कर रहा है तो समझ जा सकता हैं कि देश किस रास्ते पर जा रहा है। अनायास नहीं इसरो के सैटेलाइट प्रक्षेपण का नया मिशन फेल हो गया। देश का प्रधानमंत्री अगर सोमनाथ मंदिर में जाकर एक बार फिर से सेकुलरिज्म बनाम धार्मिक राष्ट्र विषय पर देश में बहस खड़ी करना चाहता है और जिस ज्ञान-विज्ञान के रास्ते पर चलकर देश यहां तक पहुंचा है उसके सूत्रधार नेहरू को अपमानित करना चाहता है, तो किसी के लिए यह समझना मुश्किल नहीं है कि अंधकार ही इस देश की नियति है। 

आज ऐसे दौर में जबकि पड़ोसी देश चीन विज्ञान और तकनीकी की नई ऊंचाइयां पार करते हुए दुनिया की पहली महाशक्ति बनने के मुहाने पर है। ईरान की धार्मिक सत्ता के खिलाफ आधुनिकता और लोकतंत्र के नारे गूंज रहे हैं। पाकिस्तान जैसा पड़ोसी देश धर्म की अफीम के रास्ते जाहिलियत के समुद्र में पहुंचने के बाद अब वहां से लौटने के लिए बेताब है। तब आप भारत जैसे देश में समय के पहिए को उल्टा घुमाने की कोशिश कर रहे हैं और एक ऐसे दौर में उसे ले जाकर खड़ा कर देना चाहते हैं जहां 70 सालों की सारी उपलब्धियां बेमानी लगने लगें। 

और इस काम को पीएम मोदी के नेतृत्व में पूरी तेज गति से अंजाम दिया जा रहा है। शिक्षा के उच्च संस्थानों में विज्ञान नहीं जहालत की पूजा हो रही है। दिल्ली आईआईटी में गाय और गोबर पर तीन-तीन दिनों तक सेमिनार हो रहा है। तो बीएचयू के एक विभाग में गाय का गोबर पाथने की विधि बताई जा रही है। एक बड़े संस्थान में अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब जनता के करोड़ों रुपये गाय के मूत्र पर शोध में बरबाद कर दिए गए। 

एक समुदाय के खिलाफ नफरत का पागलपन इस स्तर तक है कि जम्मू में एक मेडिकल कॉलेज की मान्यता इसलिए रद्द करवा दी जाती है क्योंकि वहां अल्पसंख्यक छात्रों की संख्या ज्यादा हो जाती है। और दिलचस्प बात यह है कि मान्यता रद्द होने के बाद लोग उसका जश्न मनाते हैं। ऐसे समय में जबकि हर जिले और तहसील तक में हृदय से लेकर मस्तिष्क तक के विशेषज्ञ चिकित्सकों और आधुनिक सुविधा से लैस अस्पतालों की जरूरत है तब लोग अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बंद होने पर जश्न मना रहे हैं। इससे बड़ी मूर्खतापूर्ण बात भला और क्या हो सकती है? सत्ता ने लोगों को अपने ही खिलाफ खड़ा कर दिया है। पागलपन इस हद तक का है कि सत्ता और उसके भक्तों के इशारे पर लोग अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने के लिए तैयार हैं।

आखिर ये कैसा दौर है? शायद ही कोई महीना हो जब पीएम मोदी देश के किसी न किसी बड़े मंदिर में न जाते हों और वहां ध्यान और आसन न लगाते हों। दरअसल 11 सालों के शासन के बाद देश जहां खड़ा हो गया है उसके बारे में अब किसी को बताने की जरूरत नहीं है। हर तरफ बेरोजगारी और बेचैनी है। युवा से लेकर किसान और मजदूर से लेकर महिलाएं सब परेशान हैं। दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों से लेकर समाज के कमजोर तबकों का जीना मुहाल हो गया है। 

उनके लिए भारत कोई देश नहीं बल्कि एक गैस चैंबर का नाम है। जिसमें सांस तक ले पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है। कभी उनकी बेटियां बलात्कार की शिकार हो रही हैं तो कहीं उन्हें दिन दहाड़े राह चलते अपमानित किया जा रहा है। कहीं दलित दूल्हों को घोड़ियों पर चढ़ने से रोका जा रहा है तो कहीं मुस्लिमों की मस्जिदों पर चढ़कर भगवाधारी तांडव कर रहे हैं। आदिवासियों की जमीनों पर कहीं अडानी कब्जा कर रहे हैं तो कहीं हजारों पेड़ों पर आरे चलवाए जा रहे हैं। और विरोध करने पर नक्सली बताकर उन्हें मार दिया जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि मोदी और डोभाल इस चीज से परिचित नहीं हैं। उनके पास तमाम एजेंसियां हैं जो हमसे और आप से ज्यादा अपडेट उन्हें दे रही हैं। ऐसे समय में जबकि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग अपने अधिकारों को लेकर सड़कों पर हैं। अपने यहां की दमनकारी सरकारों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। खुद अपने देश में ही इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों और उत्तराखंड में अंकिता को न्याय दिलाने के लिए जिस तरह से जनता खड़ी हुई और सरकार को उसने झुकने के लिए मजबूर कर दिया, ऐसे में देश में कब किसी आंदोलन का विस्फोट हो जाए कहा नहीं जा सकता है।

और अगर ऐसा कुछ होता है तो स्वाभाविक तौर पर उसके केंद्र में देश के युवा होंगे। जैसा की हमेशा से होता रहा है। ऐसे में पीएम मोदी और डोभाल द्वारा युवाओं को एकत्रित किए जाने का फैसला अनायास नहीं है। सरकार विरोधी कोई ऐसा विस्फोट हो उसके पहले ही वो उनके दिमाग में धर्म और आस्था की अफीम चढ़ा देना चाहते हैं। जिससे इस तरह की किसी आशंका को उसके गर्भ में ही मार दिया जाए। लेकिन सवाल सबसे बड़ा यही है कि क्या ये अपने मंसूबों में सफल होंगे या फिर जनता अपने हक के लिए आंदोलन का आगाज करेगी।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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